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रविवार, 15 नवंबर 2026

छठ पूजा 2026

छठ पूजा 2026 शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 से सोमवार, 16 नवंबर 2026 तक है। दिल्ली में सूर्यास्त: 5:27 pm।

दिन 1

छठ पूजा — नहाय खाय

शुक्रवार, 13 नवंबर 2026

दिन 2

छठ पूजा — खरना

शनिवार, 14 नवंबर 2026

दिन 3

छठ पूजा — संध्या अर्घ्य

रविवार, 15 नवंबर 2026

सूर्यास्त: 5:27 pm

दिन 4

छठ पूजा — उषा अर्घ्य

सोमवार, 16 नवंबर 2026

सूर्योदय: 6:44 am

दिल्ली में समय

शुक्ल षष्ठी शुरू
11:24 pm, 14 नव॰
शुक्ल षष्ठी समाप्त
2:01 am, 16 नव॰
सूर्योदय
6:43 am
सूर्यास्त
5:27 pm
चंद्रोदय
11:41 am

छठ पूजा के बारे में

छठ का तीसरा दिन (षष्ठी)। निर्जला व्रत में ही व्रती नदी या तालाब से डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

छठ पूजा की पूजा विधि

  1. 1दिन भर निर्जला व्रत रखें।
  2. 2ठेकुआ, कसार (चावल के लड्डू) और मौसमी फल तैयार कर बांस के सूप और दउरा में सजाएं।
  3. 3दोपहर बाद परिवार छठ गीत गाते हुए दउरा घाट (या घर पर पानी के टैंक) तक ले जाता है।
  4. 4सूर्यास्त पर व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं -- सूप पर जल और दूध डालकर।
  5. 5घर लौटें; बहुत से परिवार रात को आंगन में कोसी (गन्ने के मंडप के नीचे दीये) भरते हैं।

पूजा सामग्री

  • बांस का सूप और दउरा
  • ठेकुआ और कसार
  • गन्ना
  • मौसमी फल: केले, नारियल, मौसमी, सिंघाड़ा, मूली
  • अदरक और हल्दी के पौधे
  • मिट्टी के दीये और घी
  • तांबे या पीतल का लोटा और दूध
  • सिंदूर
  • व्रती के लिए नए कपड़े
  • मिट्टी की कोसी (हाथी वाला दीपदान)

दूसरे शहरों में सूर्यास्त

छठ पूजा की तारीखें

  • 2026

    रविवार, 15 नवंबर 2026

    सूर्यास्त: 5:27 pm

  • 2027

    गुरुवार, 4 नवंबर 2027

    सूर्यास्त: 5:34 pm

  • 2028

    सोमवार, 23 अक्टूबर 2028

    सूर्यास्त: 5:43 pm

लोग अक्सर पूछते हैं

2026 में छठ पूजा कब है?

छठ पूजा 2026 शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 से सोमवार, 16 नवंबर 2026 तक है। दिल्ली में सूर्यास्त: 5:27 pm।

छठ पूजा 2026 पर सूर्यास्त क्या है?

दिल्ली में सूर्यास्त: 5:27 pm।

छठ पूजा 2026 की तिथि कब शुरू और कब खत्म होगी?

दिल्ली में तिथि 11:24 pm, 14 नव॰ पर शुरू होकर 2:01 am, 16 नव॰ पर समाप्त होगी।

2027 में छठ पूजा कब है?

छठ पूजा 2027 गुरुवार, 4 नवंबर 2027 को है।

समय दिल्ली के लिए है और शहर के अनुसार कुछ मिनट बदलता है। रीति-रिवाज क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग होते हैं, अपनी परंपरा का पालन करें।

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